ईरान के यूरेनियम पर मोजतबा खामेनेई का स्टैंड दुनिया के लिए क्या मायने रखता है

ईरान के यूरेनियम पर मोजतबा खामेनेई का स्टैंड दुनिया के लिए क्या मायने रखता है

तेहरान की सत्ता के गलियारों में छिपी खामोशी अब टूट रही है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई ने एक ऐसी लकीर खींच दी है जिसे मिटाना पश्चिम के लिए आसान नहीं होगा। उन्होंने साफ कर दिया है कि ईरान का घातक यूरेनियम भंडार देश की सीमाओं से बाहर नहीं जाएगा। यह सिर्फ एक बयान नहीं है। यह एक सीधी चुनौती है। यह उन तमाम कूटनीतिक कोशिशों पर पानी फेरने जैसा है जो पिछले कई सालों से वियना और जिनेवा की बंद फाइलों में दबी हुई थीं। दुनिया भर के रणनीतिकार अब इस बात का मतलब निकालने में जुटे हैं कि क्या ईरान अब परमाणु हथियार बनाने की आखिरी दहलीज पार करने वाला है।

ईरान ने दशकों से प्रतिबंधों की मार झेली है। उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, लेकिन उसकी जिद नहीं टूटी। मोजतबा का यह ऐलान तेहरान की उसी पुरानी अकड़ को नए तेवर दे रहा है। मोजतबा खामेनेई का प्रभाव ईरान की राजनीति में किसी से छिपा नहीं है। उन्हें अक्सर अपने पिता के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता है। जब वे इस तरह का कड़ा रुख अपनाते हैं, तो इसका मतलब है कि ईरान के भीतर कट्टरपंथी गुट अब पूरी तरह से हावी हो चुका है। वे अब समझौतों के मूड में नहीं हैं।

घातक यूरेनियम और तेहरान की नई जिद

परमाणु ऊर्जा की बात जब भी आती है, तो यूरेनियम का संवर्धन सबसे संवेदनशील मुद्दा होता है। 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम को हथियार बनाने के स्तर के करीब माना जाता है। ईरान के पास इसका अच्छा खासा भंडार है। पश्चिमी देश चाहते थे कि ईरान इस भंडार को देश से बाहर भेजे ताकि उसका इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में न हो सके। मोजतबा ने इसी प्रस्ताव पर लात मारी है।

ईरान का तर्क सीधा है। उनका कहना है कि यह उनकी संप्रभुता का मामला है। वे अपनी संपत्ति किसी और को क्यों सौंपें? लेकिन इसके पीछे की कहानी थोड़ी गहरी है। ईरान को पता है कि यूरेनियम ही उनका सबसे बड़ा 'बार्गेनिंग चिप' है। अगर उन्होंने इसे बाहर भेज दिया, तो उनके पास मेज पर बैठने के लिए कुछ नहीं बचेगा। वे इसे अपनी ढाल बना रहे हैं।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का इतिहास काफी पेचीदा रहा है। साल 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) के बाद लगा था कि हालात सुधरेंगे। फिर अमेरिका ने हाथ पीछे खींच लिए। तब से ईरान ने तेजी से अपनी क्षमताओं को बढ़ाया है। आज वे उस मुकाम पर हैं जहां से पीछे हटना उन्हें अपनी कमजोरी लगता है। मोजतबा का बयान इसी ताकत का प्रदर्शन है।

मोजतबा खामेनेई का उदय और सत्ता की शिफ्ट

ईरान में मोजतबा खामेनेई की भूमिका को समझना जरूरी है। वे सार्वजनिक रूप से कम ही दिखते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे से वे 'मोहरे' हिलाते हैं। उनका यह हालिया बयान दिखाता है कि वे सिर्फ उत्तराधिकारी की रेस में नहीं हैं, बल्कि वे पॉलिसी मेकर बन चुके हैं। वे दुनिया को बता रहे हैं कि उनके नेतृत्व में ईरान और भी ज्यादा आक्रामक होगा।

पश्चिमी खुफिया एजेंसियां सालों से मोजतबा पर नजर रख रही हैं। उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो सैन्य ताकत और धार्मिक कट्टरता के संगम पर खड़ा है। उनका यह कहना कि यूरेनियम बाहर नहीं जाएगा, सीधे तौर पर अमेरिका और इजरायल को दी गई चेतावनी है। यह संदेश तेहरान के आम नागरिकों के लिए भी है—कि सरकार झुकने वाली नहीं है।

इजरायल और अमेरिका के लिए बढ़ता खतरा

इजरायल ने हमेशा से कहा है कि वह ईरान को परमाणु शक्ति नहीं बनने देगा। मोजतबा के इस ऐलान के बाद तेल अवीव में हलचल तेज होना तय है। अगर ईरान यूरेनियम बाहर नहीं भेजता, तो इजरायल के पास सैन्य कार्रवाई के अलावा बहुत कम विकल्प बचेंगे। यह पूरे मिडिल ईस्ट को बारूद के ढेर पर खड़ा करने जैसा है।

अमेरिका की स्थिति भी काफी पेचीदा हो गई है। प्रतिबंधों ने काम नहीं किया। कूटनीति फेल होती दिख रही है। अब ईरान के भीतर से उठ रही यह आवाज बताती है कि बातचीत का समय शायद खत्म हो चुका है। अमेरिका के लिए अब चुनौती यह है कि वे ईरान को बिना युद्ध के कैसे रोकें।

ईरान के पास फिलहाल इतना संवर्धित यूरेनियम है कि वह कुछ ही हफ्तों में कई परमाणु हथियार तैयार कर सकता है। मोजतबा का बयान इस खतरे को और भी वास्तविक बना देता है। वे जानते हैं कि एक बार परमाणु हथियार हासिल कर लेने के बाद उनकी स्थिति उत्तर कोरिया जैसी मजबूत हो जाएगी। फिर कोई उन्हें छूने की हिम्मत नहीं करेगा।

क्या कूटनीति के लिए कोई रास्ता बचा है

ईरान की इस जिद के बीच सवाल उठता है कि क्या अब भी कोई बातचीत मुमकिन है? सच तो ये है कि विश्वास पूरी तरह खत्म हो चुका है। ईरान को लगता है कि पश्चिम उन्हें धोखा देगा। वहीं पश्चिम को लगता है कि ईरान वक्त काट रहा है ताकि वे चुपके से अपना काम पूरा कर सकें।

मोजतबा खामेनेई का बयान इस अविश्वास की खाई को और चौड़ा करता है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे उन शर्तों को कभी नहीं मानेंगे जो ईरान को 'कमजोर' दिखाती हों। उनके लिए यूरेनियम सिर्फ एक धातु नहीं है, बल्कि ईरान की शान और सुरक्षा का प्रतीक बन चुका है।

क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले गहरे असर

मिडिल ईस्ट में ईरान और सऊदी अरब के बीच एक लंबी प्रतिद्वंद्विता रही है। अगर ईरान परमाणु हथियार के करीब पहुंचता है, तो सऊदी अरब भी हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठेगा। इससे पूरे क्षेत्र में हथियारों की एक नई रेस शुरू हो जाएगी। तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इस दौड़ में शामिल हो सकते हैं।

ईरान के भीतर भी दो फाड़ हैं। एक तरफ वे लोग हैं जो चाहते हैं कि प्रतिबंध हटें और जीवन सामान्य हो। दूसरी तरफ मोजतबा जैसे कट्टरपंथी हैं जो परमाणु ताकत को ही सब कुछ मानते हैं। फिलहाल पलड़ा कट्टरपंथियों का भारी है। वे जनता को 'राष्ट्रवाद' के नाम पर एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। यूरेनियम का बाहर न जाना इसी राष्ट्रवाद का हिस्सा है।

ईरान की अर्थव्यवस्था तेल पर टिकी है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने उसकी कमर तोड़ दी है। इसके बावजूद वे परमाणु कार्यक्रम पर अरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं। यह दिखाता है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं। उनके लिए रोटी से ज्यादा जरूरी एटम बम की धमक है। मोजतबा इसी विचारधारा के सबसे बड़े पैरोकार बनकर उभरे हैं।

आगे क्या होने वाला है

दुनिया को अब इस नई हकीकत के साथ जीना सीखना होगा। ईरान ने अपनी दिशा तय कर ली है। वे अब किसी के दबाव में नहीं आने वाले। मोजतबा खामेनेई का यह बयान आने वाले समय के लिए एक ट्रेलर मात्र है। आने वाले महीनों में हम तेहरान की तरफ से और भी कड़े कदम देख सकते हैं।

वैश्विक शक्तियों को अपनी रणनीति बदलनी होगी। अब सिर्फ प्रतिबंधों से काम नहीं चलेगा। ईरान ने साबित कर दिया है कि वह दबाव में और ज्यादा निखरकर सामने आता है। अब सवाल यह है कि क्या दुनिया एक और परमाणु शक्ति संपन्न देश को स्वीकार करने के लिए तैयार है या फिर हम एक महायुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं।

तेहरान की इस जिद ने कूटनीतिक गलियारों में सन्नाटा पसरा दिया है। मोजतबा खामेनेई ने साफ कर दिया है कि ईरान की संप्रभुता और उसका परमाणु गौरव बिक्री के लिए नहीं है। यह रुख दुनिया को एक बहुत ही अनिश्चित भविष्य की ओर ले जा रहा है। अब नजरें वाशिंगटन और यरूशलेम पर हैं कि वे इस सीधी चुनौती का जवाब कैसे देते हैं।

ईरान की स्थिति को समझने के लिए आपको वहां के आंतरिक सत्ता संघर्ष को देखना होगा। मोजतबा सिर्फ अपने पिता की बात नहीं कह रहे, वे अपनी आने वाली सत्ता की नींव रख रहे हैं। वे एक ऐसे ईरान का सपना देख रहे हैं जो पश्चिम की आंखों में आंखें डालकर बात करे। यूरेनियम उसी सपने का सबसे जरूरी हिस्सा है।

हमें अब इंतजार करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है। क्या वे ईरान पर और कड़े दबाव बनाएंगे? या फिर वे भी तेहरान की इस जिद के आगे बेबस नजर आएंगे? हकीकत तो यही है कि परमाणु तकनीक एक बार हासिल हो जाए, तो उसे वापस लेना नामुमकिन के बराबर है। ईरान अब उस बिंदु पर पहुंच गया है जहां से मुड़कर देखना उनके स्वभाव में नहीं है।

अगले कुछ हफ्ते अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण होने वाले हैं। ईरान की हर गतिविधि पर दुनिया की नजर होगी। क्या मोजतबा का यह ऐलान वाकई हकीकत में तब्दील होगा या यह सिर्फ बातचीत की मेज पर ज्यादा दबाव बनाने की एक चाल है? फिलहाल तो तेहरान के तेवर यही बता रहे हैं कि वे झुकने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।

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Alexander Murphy

Alexander Murphy combines academic expertise with journalistic flair, crafting stories that resonate with both experts and general readers alike.