ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का सच जो आपको कोई नहीं बता रहा

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का सच जो आपको कोई नहीं बता रहा

पश्चिम एशिया में इस वक्त जो चल रहा है वह सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है। यह आने वाले वक्त की वैश्विक राजनीति की दिशा तय कर रहा है। जब भी मिडिल ईस्ट में गोलियां चलती हैं या मिसाइलें गरजती हैं, तो पूरी दुनिया की नजरें ईरान और अमेरिका पर टिक जाती हैं। हालिया हफ्तों में तनाव इस कदर बढ़ गया कि लगा जंग अब शुरू हुई कि तब शुरू हुई। लेकिन अचानक ईरान के सुर बदल गए। ईरान ने बयान जारी कर दिया कि वे अब जंग खत्म करना चाहते हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कल तक अमेरिका और इजराइल को नेस्तनाबूद करने की धमकी देने वाला देश अचानक शांति की भाषा बोलने लगा।

इसके पीछे की असली वजह मीडिया की सुर्खियों में नहीं मिलेगी। इसके लिए हमें वाशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान के बंद कमरों में चल रही रणनीतियों को समझना होगा। यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। यह सीधे तौर पर अमेरिका और इजराइल की उस खतरनाक घेराबंदी का नतीजा है जिसने तेहरान को सोचने पर मजबूर कर दिया।

ईरान के पीछे हटने की असली टाइमिंग

ईरान की तरफ से यह बयान तब आया जब अमेरिकी नौसेना ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में अपनी ताकत को दोगुना कर दिया। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका ने हाल ही में इस इलाके में अतिरिक्त लड़ाकू विमान और युद्धपोत तैनात किए हैं। साथ ही इजराइल की वायुसेना लगातार ऐसी रिहर्सल कर रही है जो सीधे तौर पर ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन की गई हैं।

ईरान बेवकूफ नहीं है। उसे अच्छी तरह पता है कि अगर इस बार सीधे तौर पर जंग छिड़ी, तो नुकसान सिर्फ उसकी सेना का नहीं होगा। उसका पूरा आर्थिक ढांचा ढह जाएगा। तेहरान के रणनीतिकार जानते हैं कि जब अमेरिका और इजराइल मिलकर किसी देश को घेरते हैं, तो फ्रंटलाइन पर सिर्फ मिसाइलें नहीं होतीं। वहां साइबर हमले होते हैं, खुफिया तंत्र को अंदर से तोड़ा जाता है और आर्थिक पाबंदियों से गला घोंट दिया जाता है।

युद्ध की भाषा से शांति के प्रस्ताव तक का सफर

सोचिए, जो देश कुछ दिन पहले तक अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रदर्शन कर रहा था, वह अचानक बातचीत की मेज पर क्यों आना चाहता है। इसका सबसे बड़ा कारण है आंतरिक दबाव। ईरान इस वक्त भीषण आर्थिक संकट से जूझ रहा है। उसकी मुद्रा रियाल की कीमत रिकॉर्ड स्तर पर गिर चुकी है। महंगाई आसमान छू रही है। देश के भीतर आम जनता में सरकार के खिलाफ गुस्सा है।

ऐसे में ईरान एक और लंबी और खर्चीली जंग बर्दाश्त नहीं कर सकता। अगर युद्ध होता है, तो ईरान के तेल निर्यात ठप हो जाएंगे। तेल ही ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जब बेचने के लिए तेल नहीं होगा और खरीदने वाले देश पाबंदियों के डर से पीछे हट जाएंगे, तो देश के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन सकती है। ईरान के सर्वोच्च नेता और वहां की सरकार इस खतरे को भांप चुकी है। इसलिए, उन्होंने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने दुनिया के सामने खुद को एक शांतिप्रिय देश के रूप में पेश करना शुरू कर दिया जो युद्ध नहीं चाहता।

इजराइल का खतरनाक प्लान क्या है

इजराइल इस पूरे खेल में सबसे आक्रामक खिलाड़ी है। वह ईरान को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद ने पिछले कुछ सालों में ईरान के भीतर घुसकर कई बड़े ऑपरेशन्स को अंजाम दिया है। चाहे वह परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या हो या मिसाइल सेंटर्स में रहस्यमयी धमाके।

इजराइल ने साफ कर दिया है कि वह ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार नहीं बनाने देगा। अमेरिकी हथियारों और इंटेलिजेंस की मदद से इजराइल ने एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया है जिससे निकलना ईरान के लिए नामुमकिन सा हो गया है। इजराइल के आधुनिक F-35 लड़ाकू विमान और बंकर भेदने वाले बम सीधे तौर पर ईरान के भूमिगत ठिकानों को तबाह करने की क्षमता रखते हैं। यही वह खतरनाक तैयारी है जिसकी भनक लगते ही ईरान ने अपने कदम पीछे खींचना बेहतर समझा।

अमेरिका का दोहरा खेल

इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका को समझना भी जरूरी है। अमेरिका एक तरफ तो इजराइल को आधुनिक हथियार दे रहा है और खाड़ी में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, वह ईरान के साथ बैक-चैनल डिप्लोमेसी यानी गुप्त बातचीत के रास्ते भी खुले रख रहा है। वॉशिंगटन नहीं चाहता कि वैश्विक तेल सप्लाई चेन बाधित हो, क्योंकि इससे दुनिया भर में मंदी आ सकती है।

अमेरिका की रणनीति साफ है। वे ईरान को इतना डराना चाहते हैं कि वह खुद ही बातचीत के टेबल पर आ जाए और अपनी शर्तों को कम करे। ईरान का यह कहना कि "हम जंग खत्म करना चाहते हैं" असल में अमेरिकी दबाव की नीति की एक बड़ी जीत है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि खतरा टल गया है। बिल्कुल नहीं।

आपको आगे क्या देखने को मिलेगा

मिडिल ईस्ट की राजनीति में जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। ईरान भले ही अभी शांति की बात कर रहा हो, लेकिन वह अपने प्रॉक्सी नेटवर्क्स को मजबूत करना बंद नहीं करेगा। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूथी और गाजा में मौजूद चरमपंथी संगठन ईरान के इशारे पर काम करते रहेंगे। ईरान खुद सीधे युद्ध में नहीं उतरेगा, लेकिन वह इन संगठनों के जरिए अमेरिका और इजराइल को परेशान करता रहेगा।

आने वाले दिनों में हमें कुछ चीजें बिल्कुल साफ होती दिखेंगी।

  • ईरान और पश्चिमी देशों के बीच ओमान या कतर के जरिए गुप्त वार्ता तेज होगी।
  • अमेरिका खाड़ी देशों के साथ मिलकर ईरान पर आर्थिक पाबंदियों को और सख्त करेगा ताकि वह अपनी शर्तों से पीछे न हटे।
  • इजराइल अपनी खुफिया तैयारियों को जारी रखेगा और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पैनी नजर रखेगा।

यह पूरा मामला अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक बेहतरीन उदाहरण है जहां बिना एक भी गोली चलाए दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया जाता है। ईरान का पीछे हटना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि मौजूदा वक्त में वजूद बचाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति है। अब देखना यह होगा कि अमेरिका और इजराइल इस शांति के प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या वे ईरान को थोड़ी राहत देंगे या फिर उसकी घेराबंदी को और मजबूत करेंगे ताकि वह दोबारा सिर न उठा सके। वैश्विक बाजार और कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखने वालों को इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए क्योंकि यहां होने वाली हर हलचल सीधे आपकी जेब पर असर डालती है।

HH

Hana Hernandez

With a background in both technology and communication, Hana Hernandez excels at explaining complex digital trends to everyday readers.